बिश्वास मेरा काम पर

 

बिश्वास मेरा काम पर
बिश्वास मेरा काम पर


कबसे मैं ये

सोचता ही रहता हूँ

सोचते चोचते ही मैं

कितने घड़ी खोचुका हूँ

बितेहुए समय वाकई है कीमती

मगर गबाचुकाहुँ सोचते सोचते ही कियूं ?


जब आया है समय ये आज

पता चलहि गया सारे व राज

जो कारण मेरे असफलताका नाम

सफलता अब समस्या गया बन

क्योंकि मैं बना कर्मकुंठ अकारण

सबकुछ मजाकसा लगरहाथा काल

व साधारण बना गरियान असम्भाल ।


सोचके साथ मिलती नहीं बात

न मनको सरीर देता कोई साथ

सबकुछ बिगड़ चुकी है लगता असत

आशा अब आशंका बनके लाया रात

जहां न मुझे कोई समझता या देता साथ

अब मै मुझे समझने में हूँ असमर्थ ।


ये सच है कि अमूमन कोशिशें लाते सफलता

अब मैं समझ गयाहूं करता नहीं अनुचिन्ता

ये मेरा ध्येय बनचुकि है करताजाता करता

बिश्वास मेरा कर्मपर सुखी हमेसा रहता ।

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